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भारी उलटफेर पैटर्न

भारी उलटफेर पैटर्न

क्या है सियासी समीकरण
बुंदेलखंड क्षेत्र में 29 विधानसभा सीट आती हैं
इनमें से 23 सीटों र भाजपा का कब्जा है, जबकि 6 कांग्रेस के खाते में हैं
पिछले चुनाव में यहां मतदान का प्रतिशत 65% to 73% के बीच था
2018 में यह ट्रेंड 67% to 75% के बीच रहा है

10 मूल्य कार्रवाई कैंडलस्टिक पैटर्न 10 Price Action Candlestick Patterns

कैंडलस्टिक्स बाजार की भावना का एक चित्रमय प्रतिनिधित्व है जो हो सकता है !

कैंडलस्टिक पैटर्न में एक मोमबत्ती , दो मोमबत्तियां या तीन का संयोजन हो सकता है

कैंडलस्टिक का उपयोग पैटर्न के आधार पर एंट्री और स्टॉप-लॉस को परिभाषित करने के लिए किया जाता है गठन।

इस ब्लॉग में , हम यह देखने जा रहे हैं कि कैसे हम कई कैंडलस्टिक पैटर्न का उपयोग करके कुंजी को खोज सकते हैं चार्ट में उत्क्रमण क्षेत्र।

1. उत्क्रमण कैंडलस्टिक पैटर्न:

· यह किस तरह का दिखता है ?

यह दो कैंडलस्टिक पैटर्न है।

दूसरी मोमबत्ती की कीमत को अस्वीकार करने वाली एक अनिश्चित मोमबत्ती होने की सबसे अधिक संभावना है दोनों दिशाओं से।

तेजी से उलटने के लिए , दूसरी मोमबत्ती पहली मोमबत्ती के निचले हिस्से को तोड़ती है और "निचला" बनाती है कम ” और पिछली लाल मोमबत्ती के ऊपर बंद हुआ।

मंदी के उलटफेर के लिए , दूसरी मोमबत्ती पहली मोमबत्ती की ऊंचाई को तोड़ती है और बनती है " उच्च उच्च" और पिछली हरी मोमबत्ती के करीब बंद।

· इसका क्या मतलब है ?

तेजी के पैटर्न के लिए , कीमत को पिछले कैंडल लो के नीचे समर्थन मिला , यह समर्थन

इतना मजबूत था कि यह कीमत को पिछली मोमबत्ती की तुलना में अधिक बंद करने के लिए प्रेरित करता है।

मंदी के पैटर्न के लिए , कीमत को पिछली मोमबत्ती के ऊपर प्रतिरोध मिला , यह प्रतिरोध इतना मजबूत था कि यह कीमत को पिछली मोमबत्ती की तुलना में कम बंद करने के लिए प्रेरित करता है। बंद करे।

क्या है क्रॉस वोटिंग पैटर्न? राष्ट्रपति चुनाव के बाद बीजेपी कर रही ये तैयारी

राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम से पता चलता है कि क्रॉस वोटिंग पैटर्न बड़ा मुद्दा बन गया है. ऐसा कहा भारी उलटफेर पैटर्न जा रहा है कि भाजपा इसका अध्ययन भाजपा कर रही है.

  • राष्ट्रपति चुनाव में हुई भारी क्रॉस वोटिंग
  • परिणाम का अध्ययन कर रही है भाजपा

ट्रेंडिंग तस्वीरें

क्या है क्रॉस वोटिंग पैटर्न? राष्ट्रपति चुनाव के बाद बीजेपी कर रही ये तैयारी

नई दिल्ली: आम चुनाव से पहले, विपक्ष को करारा झटका लगा है, जैसा कि राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम से पता चलता है. परिणाम का भाजपा अध्ययन कर रही है, क्योंकि एक दर्जन से अधिक राज्यों में विपक्षी विधायकों और सांसदों ने द्रौपदी मुर्मू को वोट दिया है.

100 से अधिक विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की

सूत्रों के अनुसार 100 से अधिक विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की और भारी उलटफेर पैटर्न भारी उलटफेर पैटर्न एक दर्जन से अधिक विपक्षी सांसदों ने द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में मतदान किया.

आंकड़ों के अनुसार, असम विधानसभा में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष को 45 वोट होने के बावजूद 20 वोट मिले, बिहार में छह विधायकों ने एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोट किया, क्योंकि सत्तारूढ़ दल की ताकत 127 है, लेकिन 133 वोट मिले. इसी तरह छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के दो विधायकों ने यशवंत सिन्हा को वोट नहीं दिया.

हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि किस विधायक ने एनडीए उम्मीदवार को वोट दिया.

पीएम मोदी की राजनीति से प्रभावित हैं विधायक?

भाजपा सूत्रों ने कहा कि वे इस बात का अध्ययन करेंगे कि कितने विधायक प्रधानमंत्री की विकास की राजनीति से प्रभावित हैं और फिर इस पर विचार करेंगे. हालांकि पार्टी नेताओं का दावा है कि एकतरफा जीत की बहुत उम्मीद थी.

बड़ा झटका गुजरात से लगा जहां 10 विपक्षी विधायकों ने द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट किया. राज्य में इस साल चुनाव होने हैं और चुनाव में कांग्रेस का भविष्य दांव पर है.

कांग्रेस और विपक्षी दल के लिए सिरदर्द बनी क्रॉस वोटिंग

मध्य प्रदेश में जहां कांग्रेस द्वारा विधायकों को खरीदने का आरोप लगाया गया है, वहीं पार्टी के करीब 15 से 16 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की, जो कमलनाथ के लिए बड़ा सिरदर्द है.

महाराष्ट्र में एक दर्जन से ज्यादा गैर एनडीए विधायकों ने मुर्मू को वोट दिया. उन्होंने केरल में भी वोट हासिल किए, जहां बीजेपी का कोई विधायक नहीं है.

राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल 4,754 मत पड़े थे, जिसकी प्रक्रिया गुरुवार को परिणाम घोषित होने के साथ समाप्त हो गई.

अंतिम मिलान से पता चला कि डाले गए कुल मतों में से 4701 वैध और 53 अमान्य थे. भारत के 15वें राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को 2,824 प्रथम वरीयता वोट मिले, जिसका मूल्य 6,76,803 है. जीत का कट-ऑफ अंक 5,28,491 है. संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को 3,80,177 के मूल्य के साथ 1,877 वोट मिले.

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बुंदेलखंड में उलटफेर के आसार, किसे भारी पड़ेगी ‘सूखे’ की मार

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भोपाल। बुंदेलखंड के छह जिलोंं की विधानसभा सीटों पर पिछली बार के मुकाबले में मतदान प्रतिशत में इजाफा हुआ है। बुंदेलखंड का बड़ा मुद्दा सूखा, पलायन और बेरोजगारी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस बार लोग यहां बदलाव चाहते हैं। पलायन की समस्या को दूर करने के लिए और बदलाव की आस लगाए बैठे मजदूरों और परदेस में रोजगार की तलाश में जाने वाले लोगों ने मतदान करना चुना। जानकारों का कहना है कि इस बार यह समीकरण बुंदेलखंड की सियासत का नया अध्याय लिखेंगे।


क्या है सियासी समीकरण
बुंदेलखंड क्षेत्र में 29 विधानसभा सीट आती हैं
इनमें से 23 सीटों र भाजपा का कब्जा है, जबकि 6 कांग्रेस के खाते में हैं
पिछले चुनाव में यहां मतदान का प्रतिशत 65% to 73% के बीच था
2018 में यह ट्रेंड 67% to 75% के बीच रहा है

प्रदेश का यह क्षेत्र बीते कई दशकों से बड़े पैमाने पर पलायन की समस्या से जूझ रहा है। रोजगार नहीं मिलने से परेशान स्थानीय लोग और युवा वर्ग दूसरे शहरों में जाने पर मजबूर हैं। किसान भी पानी की मार झेल रहा है। सूखे की वजह से यहां के किसान बर्बादी की कगार पर हैं। कई गांव खाली हो चुके हैं। जमीन भी बंजर हो गई है। सरकार के उदासीन रवैये से यहां का विकास ठहरा हुआ है। जहां पानी की व्यवस्था है और खेतीबाड़ी है वहां फसलों के पूरा होने पर किसान लौट आते हैं। लेकिन इस समस्या का हल किसी भी पार्टी ने अब तक नहीं किया है। एमपी विधानसभा चुनाव ऐसे समय हुआ जब बुवाई का काम लगभग पूरा हो चुका था और खाली बैठे परिवार मजदूरी की तलाश में गांव छोड़ गए। कई गांव में घरों पर ताले लटके थे। इसके बावजूद लोगों में मतदान को लेकर खासा उत्साह रहा।

खुरई में हुई सबसे अधिक वोटिंग

विधानसभा वार अगर मतदान के पैटर्न पर नजर डालें तो सागर जिले की खुरई में 81 फीसदी मतदान भारी उलटफेर पैटर्न दर्ज हुआ है। यहां पिछली बार 75.74 प्रतिशत मतदान हुआ था। क्षेत्र के अन्य विधानसभा के मुकाबले सागर विधानसभा में इस बार सबसे कम मतदान दर्ज किया गया है। यहां 64.52% मतदान दर्ज किया गया है। बुंदेलखंड के छह जिलों में छतरपुर, दमोह, टीकमगढ़, पन्ना, भारी उलटफेर पैटर्न सागर और दतिया में प्रदेश के औसत के मुकाबले वोटिंग प्रतिशत कम रहा। लेकिन अगर यहां का औसत पिछले विधानसभा चुनाव के प्रतिशत से भारी उलटफेर पैटर्न तुलना करें तो यह इस बार दो फीसदी बढ़ा है।

क्या कहते हैं जानकार

जानकारों का कहना है कि इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ना वर्तमान सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है। पिछले चुनाव की तुलना में यहां मतदान ज्यादा हुआ है। वोटिंग का यह ट्रेंड सत्ताधारी दल के भारी उलटफेर पैटर्न लिए खतरा दर्शा रहा है। सूत्रों के मुताबिक स्थानीय लोगों में सरकारी योजनाओं के लेकर आक्रोश है। सामान्य तौर पर बुंदेलखंड में नवंबर के महीने में लोग अपने कामकाज को लेकर बाहर रहते हैं। लेकिन इस बार बढ़े प्रतिशत के हिसाब से ऐसा जाहिर हो रहा है कि लोगों में बदलाव को लेकर गुस्सा पनप रहा है। जिस वजह से उन्होंने यहां रुक कर भारी मतदान किया है।

हिमाचल की वो सीटें जो हर बार बदलती हैं मिजाज, कायम रहता है प्रदेश का 'रिवाज'

हिमाचल प्रदेश की सियासत में साढ़े तीन दशक से हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड देखने को मिल रहा है. राज्य की महज 23 विधानसभा सीटें है, जहां पर पांच साल के बाद विधायक बदल जाते हैं. इसके चलते सत्ता परिवर्तन का मिजाज बना हुआ है. इसके अलावा कांग्रेस और बीजेपी के बीच चार से आठ फीसदी वोटों के अंतर से सारी समीकरण बदल जाते हैं.

जयराम ठाकुर और प्रतिभा सिंह

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 08 नवंबर 2022,
  • (अपडेटेड 08 नवंबर 2022, 2:16 PM IST)

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में महज चार दिन बाकी है और प्रचार अभियान थमने में सिर्फ दो दिन रह गए हैं. कांग्रेस और बीजेपी ने अपनी-अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है. सूबे में पिछले साढ़े तीन दशकों से हर पांच साल में सत्ता बदलने का ट्रेंड चला आ रहा है. बीजेपी सत्ता परिवर्तन के सिलसिले को तोड़ने की कवायद में है तो कांग्रेस इस ट्रेंड को बरकरार रखना चाहती है. हालांकि, यह ट्रेंड पूरे हिमाचल का नहीं है बल्कि 23 सीटें है, जिनका हर चुनाव में 'मिजाज' बदल जाता है और सत्ता परिवर्तन का 'रिवाज' बन गया है.

हिमाचल में 2003 से लेकर 2017 तक हुए चार विधानसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न को देखें तो राज्य में चार से आठ फीसदी के वोटों के अंतर से सरकारें बनती और बिगड़ती रही हैं. प्रदेश में जब-जब वोटिंग पैटर्न में इजाफा हुआ है तो सियासी दलों की सीटों में भी बढ़ा अंतर दिखा है. ऐसे में देखना है कि इस बार वोटिंग ट्रेंड किस तरह से रहता है, क्योंकि हिमाचल प्रदेश एक छोटा राज्य हैं, जहां पर कुछ वोटों के इधर से उधर होने पर सारे समीकरण बदल जाते हैं?

हिमाचल में 68 विधानसभा सीटों वाला भले ही छोटा राज्य हो, लेकिन यहां चुनावी पंडितों के लिए भविष्यवाणी करना कोई आसान काम नहीं है. प्रदेश की अधिकांश विधानसभा सीटों पर 90 हजार से कम वोटर हैं जबकि लाहौल और स्पीति जैसी कुछ सीटों पर 30 हजार से भी कम मतदाता हैं. ऐसे में चुनाव में जीत-हार का मार्जिन भी कम होता है. ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी सत्ता पर काबिज होने के लिए चार से सात फीसदी वोटों के अंतर से बढ़त बनाने के लिए लड़ाई लड़ रही हैं.

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4 से 7 फीसदी वोटों के अंतर का खेल

साल 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 41 फीसदी वोटों के साथ 43 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि बीजेपी को 35.38 फीसदी वोटों के साथ 16 सीटें मिली थी. सात फीसदी वोटों के अंतर ने कांग्रेस की 27 सीटें बढ़ा दी थी. इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनाव के नतीजे देखें तो बीजेपी 43.78 फीसदी वोटों के साथ 41 सीटें और कांग्रेस 38.90 फीसदी वोटों के साथ 23 सीटें जीती थी. इस चुनाव में 4.88 फीसदी वोटों के अंतर ने 18 सीटें बीजेपी की बढ़ा दी थी.

2012 के विधानसभा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 42.81 फीसदी वोटों के साथ 36 सीटें जीती तो बीजेपी को 38.47 फीसदी वोटों के साथ 26 सीटें मिली थी. इस तरह से करीब चार फीसदी वोटों के अंतर ने बीजेपी की 10 सीटें बढ़ा दी थी. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव नतीजे को देखें तो बीजेपी 48.79 फीसदी वोटों के साथ 44 सीटें जीती जबकि कांग्रेस ने 41.68 फीसदी वोटों के साथ 21 सीटे जीतने में कामयाब रही. इस तरह सात फीसदी वोटों के अंतर के चलते बीजेपी को कांग्रेस से 23 सीटें ज्यादा मिली थी.

कांग्रेस-बीजेपी किन सीटों पर मजबूत

हिमाचल में अगर सत्ताधारी पार्टियों (सरकारों) को वोट देने के इतिहास और ट्रेंड को देखते है तो लगता है कि बीजेपी को इस बार चुनाव में कांग्रेस से हार मिल सकती है. हालांकि, आंकड़े और सियासी समीकरण को देखें तो इस बार चुनाव में बीजेपी अपनी सत्ता को बचाए रखने में सफल रह सकती है, लेकिन 21 सीटों पर उसके बागी उसकी राह में रोड़ा बन गए हैं.

हिमाचल में पिछले दो विधानसभा चुनावों के आंकड़ों के आधार पर देखें तो कांग्रेस की तुलना में बीजेपी के पास कहीं ज्यादा मजबूत सीटें हैं. हिमाचल की 18 भारी उलटफेर पैटर्न सीटे ऐसी हैं जिन पर बीजेपी ने पिछले चुनावों से अपना कब्जा बरकरार रख रहा है जबकि कांग्रेस 12 सीटों पर अपना वर्चस्व भारी उलटफेर पैटर्न कायम रखा है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं 18 सीटों पर बीजेपी ही या 12 सीटों पर कांग्रेस ही जीत दर्ज करेगी. इनमें से कई सीटों पर जीत हार का मार्जिन बहुत बड़ा नहीं है, ऐसे में इन सीटों पर उलटफेर भी हो सकता है.

हिमाचल की 23 सीटों पर बदलता मिजाज

हिमाचल प्रदेश की कुल 68 में से 23 सीटें ऐसी हैं, जिन्होंने सही मायने में एक ट्रेंड सेट किया है. 2012 में कांग्रेस ने जीती थी तो 2017 में बीजेपी ने कब्जा जमाया था. इससे यह पता चलता है कि हर पांच साल पर इन 23 सीटों के वोटर अपना सियासी मिजाज बदल देते हैं. 1985 के बाद से किसी पार्टी को लगातार दो बार सरकार चलाने का मौका नहीं मिला है. भाजपा और कांग्रेस को ही हरपांच साल पर शासन करने का मौका मिलता रहा है. ऐसे में इन 23 सीटों पर जीत की उम्मीद कांग्रेस लगाए हुए है. हिमाचल की हर सीट पर पांच साल में विधायक बदल जाते हैं, जिनमें ज्यादातर एससी और एसटी समुदाव वाली सुरक्षित सीटें है. लाहौल, स्पीति, भरमौर, बैजनाथ जैसी सीटें शामिल हैं.

किस जिले में किसका पलड़ा भारी रहा

हिमाचल के 12 में से आठ जिलों में बीजेपी 2017 में कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलीं थीं. वहीं, चार जिलों में कांग्रेस को बीजेपी से ज्यादा सीटें मिली थी. बीजेपी को कांगड़ा, मंडी, बिलासपुर, चंबा, कुल्लू, सिरमौर, लाहौल स्पीती और ऊना में बढ़त मिली थी. वहीं, कांग्रेस को हमीरपुर, किन्नौर, शिमला और सोलन जिले में बीजेपी से ज्यादा सीटें आई थी. हिमाचल के कांगड़ा में सबसे ज्यादा 15 सीटे तो मंडी में 10 और शिमला में आठ सीटें हैं. इन तीनों बड़े जिलों में से कांगड़ा और मंडी में बीजेपी को एक तरफा जीत मिली थी जबकि शिमला में कांग्रेस आगे रही थी. इन तीन ही जिलों के सियासी समीकरण हिमाचल की सत्ता का रुख तय करते हैं?

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